वादे थे वादों का क्या? इन मोर्चों पर नाकाम रही मोदी सरकार!

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नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर काबिज हुए चार साल पूरे हो रहे हैं. बड़े-बड़े वादों और उम्मीदों के साथ आई ये सरकार काम का जिक्र और फिक्र करती तो दिखी लेकिन अहम मोर्चों पर उसे वैसी कामयाबी नहीं मिली जैसी उससे उम्मीद की जा रही थी.

रोजगार- बीजेपी हर साल एक करोड़ नौकरियों के लुभावने वायदे के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन सरकार सबसे ज्यादा विफल रोजगार के क्षेत्र में ही रही है. श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में हर रोज 550 नौकरियां खत्म हो रही हैं. स्वरोजगार के मौके भी खत्म हो रहे हैं. भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों वाला देश बन गया है. लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक पिछले कारोबारी साल में मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट, हेल्थ और एजुकेशन समेत 8 सेक्टरों में सिर्फ 2.30 लाख नौकरियां पैदा हुईं जबकि देश में हर साल 1.80 करोड़ लोग वर्कफोर्स में जुड़ जाते हैं.

पेट्रोल-डीजल के दाम- यूपीए सरकार के दौरान विपक्ष ने जिस बात को लेकर कांग्रेस की सबसे ज्यादा आलोचना की थी, वो थे पेट्रोल-डीजल के दाम. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 2013-14 में जितना उछाल था उसके हिसाब से बाजार की हालत आज ठीक है. हालांकि फिर भी देश में पेट्रोल-डीजल के दाम अब तक के शिखर पर हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार दिल्ली में 14 सितंबर 2013 को एक लीटर पेट्रोल 76.06 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था. 20 मई 2018 को ये 76.24 रुपये प्रति लीटर का है. यानी ये अपने अब तक के सबसे महंगे स्तर पर है. इसलिए कहा जा सकता है कि मोदी सरकार पेट्रोल के दाम कम करने में पूरी तरह विफल रही है.

महिला अपराध- चुनाव से पहले मोदी सरकार ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध पर भी यूपीए सरकार को घेरा था. लेकिन मोदी सरकार भी पिछले तीन साल में इस मामले में कुछ खास नहीं कर सकी है. साल 2016 में भी महिलाओं के खिलाफ अपराध के 3 लाख 38 हजार से अधिक केस दर्ज किए गए, जो कि 2015 के मुकाबले काफी अधिक हैं. बलात्कार, बलात्कार की कोशिश, अपहरण, छेड़छाड़, आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. हाल ही में बच्चियों के साथ रेप के दोषी को फांसी का कानून सरकार ने बनाया है जिसका असर आने वाले वक्त में ही देखा जा सकेगा.

नोटबंदी- नोटबंदी को भले ही मोदी सरकार अपना मास्टरस्ट्रोक मानती हो, लेकिन उससे वांछित परिणाम सरकार हासिल नहीं कर सकी. न काला धन खत्म हुआ और न नकली नोटों में कमी आई. आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार करीब 99 फीसदी पुराने नोट वापस आ गए हैं. नोटबंदी के फायदे की बजाय नुकसान ये हुआ कि इससे देश की जीडीपी को तगड़ा झटका लगा और अब भी वो उससे पूरी तरह उबर नहीं सकी है.

सीमा पर मरते जवान- यूपीए सरकार पर निशाना साधने लिए मोदी अक्सर उसकी पॉलिसी को ‘मर जवान-मर किसान’ कहा करते थे लेकिन खुद उनकी सरकार में सीमा पर मरने वाले जवानों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है. एक आरटीआई के जवाब में सामने आया था कि जम्मू-कश्मीर में सीजफायर वॉयलेशन और क्रॉस बॉर्डर फायरिंग में मनमोहन के मुकाबले मोदी सरकार में 4 गुना ज्यादा जवान शहीद हुए. 2010 से 2013 के बीच 10 जवान तो 2014 से सितंबर 2017 तक 42 जवान शहीद हुए.

शिक्षा में विफल- सरकार में क्वालिटी एजुकेशन, इनोवेशन, वैदिक और गुरुकुल शिक्षा को अपनाने से लेकर देशभक्ति, नैतिक शिक्षा पर जोर तक की बातें तो होती रही हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि पिछले चार साल में मोदी सरकार नई शिक्षा नीति नहीं तैयार कर पाई है. इसके लिए एक मंत्री ने एक समिति तो दूसरे मंत्री ने दूसरी समिति बना दी, लेकिन अभी तक नतीजा शून्य ही रहा है. वहीं नए संस्थान बनाने, बच्चों की नौकरी, उच्च शिक्षा में रियायत देने के मामले में सरकार फेल रही और बजट से भी शिक्षा जगत को निराशा ही हाथ लगी. उल्टा अलग-अलग वजहों से छात्र सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरते दिखे.

अर्थव्यवस्थाः अर्थव्यवस्था की विकास दर के बारे में पिछले चुनाव में दावे किए गए थे कि यह बढ़कर 10 फीसदी तक हो जाएगी. लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 में देश की अनुमानित विकास दर 7.5 फीसदी ही है. यह आंकड़ा मनमोहन सिंह के आखिरी वर्ष की विकास दर 6.9 फीसदी (संशोधित) से थोड़ा ही ज्यादा है. वहीं नोटबंदी और जीएसटी के झटके से छोटे कारोबारियों को जो नुकसान उठाना पड़ा उसका असर भी जीडीपी पर पड़ा. बैंकों की हालत खराब है, एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं और एनपीए एक बड़ा संकट बनकर सामने आया है.

सड़क सुरक्षाः मोदी सरकार के चार साल पूरे हो रहे हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मसले पर एक जरूरी विधेयक को सरकार अब तक कानून का रूप नहीं दिला पाई है. देश में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में करीब डेढ़ लाख लोगों की मौत हो जाती है. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि सड़क सुरक्षा पर कानून कितना जरूरी है. मोटर वाहन ‘संशोधन’ विधेयक को अगस्त, 2016 में ही केंद्र सरकार ने मंजूरी प्रदान कर दी थी. यह लोकसभा में पारित भी हो चुका है. इसमें यातायात के नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने का प्रस्ताव है. लेकिन अभी तक यह बिल ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म और कल्चर की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी के पास रिव्यू के लिए पेंडिंग पड़ा हुआ है.

किसानः मोदी सरकार में चार साल में अन्नदाता की झोली भी खाली ही रही. विपक्ष लगातार विरोध करता रहा कि सरकार ने किसानों को लागत का डेढ़ गुना दिलाने का वादा पूरा नहीं किया. वहीं अक्टूबर 2017 में आई सीएसओ की रिपोर्ट के अनुसार कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर 1.9 प्रतिशत रह गई जबकि यूपीए सरकार में कृषि क्षेत्र की औसत वृद्धि दर चार प्रतिशत थी. ना किसान को अपनी फसल का उचित मिला है और ना ही कोई राहत और किसान मरने को मजबूर है. बता दें कि सरकार के कार्यकाल में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में 45 फीसदी का इजाफा हुआ है.
 

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