निर्माताः ट्रीटॉप एंटरटेनमेंट/बैंचमार्क पिक्चर्स
निर्देशकः उमेश शुक्ला
सितारेः अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जिमित त्रिवेदी
रेटिंग ***
ये जीना भी कोई जीना है लल्लू। सुस्त-सुस्त। ढीले-ढीले। मरे-मरे। न सांसों के आने की खबर, न जाने का पता। ‘102 नॉट आउट’ ऐसी जिंदगी के खिलाफ है। जब तक जियो, जिंदादिली से जियो। स्फूर्ति, चुस्ती और खुशी से जियो। मूल संदेश यही है। 102 बरस के दत्तात्रेय वखारिया (अमिताभ बच्चन) की समस्या है उनका 75 साल का बेटा, बाबूलाल (ऋषि कपूर)। जो बूढ़ा हो चुका है। नहाता भी घड़ी के टाइम से है और डॉक्टर के पास हर दिन पहुंच जाता है। बरसों से वह एक ही चादर लपेट कर सोता है और उसे खुश रहने से एलर्जी है।
दत्तात्रेय ने पढ़ा है कि ज्यादा दिनों तक जीना है तो अपने आसपास उदास, बोर लोगों को न रहने दो। उदासी और बोरियत छूत की बीमारी है। नतीजा यह कि दत्तात्रेय बूढ़े बेटे को वृद्धाश्रम में भर्ती कराने का फैसला करते हैं। बेटा तैयार नहीं है। तब दत्तात्रेय कहते हैं कि उनके साथ रहना है तो कुछ शर्तें लागू होंगी। वो क्या…? ‘102 नॉट आउट’ जिंदगी के पक्ष में खड़ी फिल्म है लेकिन इसकी कथा/पटकथा में गंभीर समस्याएं हैं। वे इसे कमजोर करती हैं। खास तौर पर पहले हिस्से में, जहां फिल्म एक ही जगह पर ठहरी हुई, धीमी रफ्तार से उबाती है। एक के बाद एक शर्तें सामने आती हैं और उनमें कुछ विशेष नहीं होता। आप सिर्फ पाते हैं कि पिता अपने बेटे को रास्ते पर लाना चाहता है। चिंता छोड़, सुख से जी।
दूसरे हिस्से में जरूर थोड़ा रोमांच है जब कहानी कुछ कुछ फिल्म ‘बागवां’ (2003) के अंदाज में आगे बढ़ती है। यहां बेटा-बेटी की जगह पोता नजर आता है। फिल्म उस पीढ़ी की सख्ती से खबर लेती है, जो अपने बूढ़े मां-बाप को भुला देती है। दत्तात्रेय का नया रूप उभरता है और बाबू के रंग भी धीरे-धीरे बदलते हैं। वास्तव में ‘102 नॉट आउट’ कुछ पंच और अमिताभ बच्चन की बेहतरीन अदायगी की वजह से देखने के काबिल है। वर्ना कुछ खास नहीं है। बढ़ती उम्र के बावजूद अमिताभ ठहरने का नाम लेते। उनकी ऊर्जा हैरान करती है। अभिनय उनके बाएं हाथ का खेल लगने लगता है।
movie Review: अमिताभ बच्चन के लिए देखें '102 नॉट आउट', जिंदगी में रोमांच रहना चाहिए
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